रेल बजट आने को है... और लोगों में सबसे ज़्यादा कौतूहल किराए को लेकर है... किराया बढ़ेगा... नहीं बढ़ेगा... दीदी इस बार क्या करनेवाली हैं... गणित तो यही कहता है कि आम आदमी को किराए को लेकर चिंतित होने की ज़रुरत नहीं है... बंगाल में इसी साल चुनाव होने हैं... और सियासी समीकरण ममता बनर्जी को कतई इजाज़त नहीं देते कि वे आम लोगों की नाराज़गी मोल लें... लेकिन रेलवे की सेहत थोड़ी पतली चल रही है... और इसका इज़हार दीदी ने अपने श्वेत पत्र में कर दिया था... फिर भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है... कमाई के लिए ममता की नज़र होगी उच्च श्रेणी की जेब पर... यानि सेंकेंड एसी... फर्स्ट एसी.... फर्स्ट क्लास... और राजधानी.. शताब्दी के किराये में इज़ाफा हो सकता है...
लेकिन इतने से ही रेलवे की अधूरी पड़ी परियोजना के लिए पैसों का इंतज़ाम नहीं हो सकता... और आर्थिक गणित कहता है कि रेल के ख़ज़ाने में 75 फीसदी रकम माल ढुलाई से आता है... और 25 फीसदी हिस्सा यात्री किराया कवर करता है... लेकिन माल ढुलाई का किराया बढ़ाना मतलब पहले से बढ़ी हुई महंगाई में और आग लगाना होगा... फिर भी ममता के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है... लिहाज़ा आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर बाकी चीज़ों की ढुलाई पर करीब 12 फीसदी का इज़ाफा किया जा सकता है...
पुराने बजट में ममता ने ढेरों वादे किए थे... लेकिन उन वादों ने भी अभी तक मुक्कमल तस्वीर नहीं देखी है... वजह यही है कि पुराने ढांचें को ही मज़बूत करने के लिए रेलवे की कमर पर बहुत बोझ है... और रेल मंत्री को पता है कि संसाधनों की व्यवस्था सिर्फ रेलवे के आंतरिक स्रोतों से नहीं हो सकती... यानी वित्तीय चुनौतियां हैं... और उनमें नई योजनाओं के लिए पैसा जुटाना एक बड़ी चुनौती है.. और इसके लिए ममता दीदी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की ओर रुख कर सकती हैं... जिससे निवेशकों के ज़रिए रेलवे की माली हालत को थोड़ा बल मिलेगा... और वो यात्री सुविधाओं पर ध्यान दे सकेंगी...
लेकिन इतने से ही रेलवे की अधूरी पड़ी परियोजना के लिए पैसों का इंतज़ाम नहीं हो सकता... और आर्थिक गणित कहता है कि रेल के ख़ज़ाने में 75 फीसदी रकम माल ढुलाई से आता है... और 25 फीसदी हिस्सा यात्री किराया कवर करता है... लेकिन माल ढुलाई का किराया बढ़ाना मतलब पहले से बढ़ी हुई महंगाई में और आग लगाना होगा... फिर भी ममता के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है... लिहाज़ा आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर बाकी चीज़ों की ढुलाई पर करीब 12 फीसदी का इज़ाफा किया जा सकता है...
पुराने बजट में ममता ने ढेरों वादे किए थे... लेकिन उन वादों ने भी अभी तक मुक्कमल तस्वीर नहीं देखी है... वजह यही है कि पुराने ढांचें को ही मज़बूत करने के लिए रेलवे की कमर पर बहुत बोझ है... और रेल मंत्री को पता है कि संसाधनों की व्यवस्था सिर्फ रेलवे के आंतरिक स्रोतों से नहीं हो सकती... यानी वित्तीय चुनौतियां हैं... और उनमें नई योजनाओं के लिए पैसा जुटाना एक बड़ी चुनौती है.. और इसके लिए ममता दीदी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की ओर रुख कर सकती हैं... जिससे निवेशकों के ज़रिए रेलवे की माली हालत को थोड़ा बल मिलेगा... और वो यात्री सुविधाओं पर ध्यान दे सकेंगी...

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